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Showing posts from January 3, 2021

क्यों आए थे?

ये वक़्त-बेवक़्त की बचकानी बातें हैं, इन्हें जाने दो.. तुम समझ नही पाओगी,तुम्हे समझाने दो..  ऐसी तरक़ीब से उन्होंने उलझा के रख दी बड़ी मुश्किल से जो मसले सुझाए थे रहना - ना रहना बाद कि बाते हैं गर नामालूम था पता, तो क्यों आये थे?  हाँ ठीक! तुम सही, हम गलत,  सब गलत, ये इश्क गलत.. हमने तो न दी थी वजह, ना रास्ते बताए थे, गर ना मालूम था पता, तो क्यों आए थे?   मान लेते हैं तुम यूँ ही निकल आये, चलो जाने दो..  हम फिर संभाल जाएंगे, थोड़ा टूट जाने दो..  ये इश्क के फ़लसफ़े हैं, यूँ ही नही बन जाते..  कभी तो आओगे पलट के, तो पूछ लेंगे..  क्यों आए थे? 

ए वक्त ,तू गवाह है

ऐ वक्त, तू गवाह है.. कभी वो सजी हुई वैश्या सा बिछा है मेरे आगे.. और ये भी तूने देखा है, कैसै सुबह के सूरज सा जला है वो देखा है यह भी  बनारस के पाखंडी सा घूनी रमा और जो फिर हर रात वो गले में इतर, होंठ लाल कर एक नई कली मसलने चला.. देखा है तूने मुझे भी उसके सिर को रखा है गोद में एक माँ की तरह और परोसा है खुद को मैने भरे वॅक्षो से मेघ की तरह ए वक्त ,तू गवाह है वो बिछा है मेरे आगे, वेश्या की तरह.. मुड़ा ना वो, गुजरा जब मेरे  शामियाने से आगे, नज़रें बचा फिर भी गिरी उसकी निगाहें कनखियों से हमपर  के देख ना लूँ मैं कहीं उसके कुर्ते पर पड़े नयी कली के निशान.. मेरे खरीदार ने निभाये हैं किरदार कई, कभी मेरी तरह, कभी अपनी तरह... 5/1/2014