Skip to main content

टपरी पर उनकी सिगरेट..

बड़े अरसे बाद वो मिल गए उसी चौराहे पर
टपरी के कोने में सिगरेट जलाए होते थे
निकलेंगे अभी हम बस इसी रास्ते से
उन चाय के न जाने कितने बकाए होते थे
हर रोज़ फेंक देते थे वो अध बुझी सी बातें
कोई देख लेगा तो क्या हो
और हर रोज़ फिर जला लेते थे ख़ुद-बुनी यादें
के एक रोज़ कह ही दे तो क्या हो

बड़े अरसे बाद वह मिल गए उसी कुर्ते में
होली के दाग छुड़ाए होते थे
लटकती थी एक जेब उनकी माचिस से
ना जाने कैसे ऐब लगाए होते थे

बड़े अरसे बाद वो मिल गए उसी चौराहे पर
टपरी के कोने में, सिगरेट जलाए होते थे..

Never liked him smoking, never liked that he couldn't come and say "I like you".. 

Comments

Popular posts from this blog

सलाहों का बंदरबाट

एक तो काले रंग में दाग वैसे ही नज़र नहीं आते और उसपर न्याय की मूर्ती को अँधा और बना दिया गया, की बस जनाब सालो साल खेलते रहिये आँख मिचोली और देखते रहिये बंदरबांट सलाहगारो और मददगारो के बीच, फिर अगर उस सलाह से कुछ मदद मिल जाए तो खुदा का शुक्र मनाइये और आपको बचाने वाले से जीवन भर की बची कुची बचत पर चपत लगवा कर बाकी वक़्त बिता लीजिये। निष्पक्ष और न्यायप्रिय ठेकेदार सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे चाहे आप कुछ भी कर लें, वे अपने साथ पक्षपात कभी नहीं होने देंगे और आपके पूर्वानुमान, अधकचरे ज्ञान को तारीखों की धीमी आंच पर तपा देंगे की आप पक्ष और विपक्ष का ही सही अनुमान लगाते रह जायेंगे। बस इसलिए वक़ालत नही कर पाए! 

अधूरा

शाख से टूटे पत्ते आ कर मेरी गोद में गिरे थे, पीले, चुरमुरे, रंगमिटे से  आज उनमे से एक पत्ता किताब के पन्नो के बीच मिल गया, भूरा, चुरमुरा, अधूरा सा, ठीक वैसा ही ठहरा जैसे वो पल ठहरा है जब बारिष से पहले  ज़ोरों कि हवा में उलझ गयी थी मेरी लटें, और सुलझाने के बहाने तुमने गालों को छुआ था मेरे, हाँ, वो पल, वैसा ही है , मटमैला, चुरमुरा और अधूरा..

ए वक्त ,तू गवाह है

ऐ वक्त, तू गवाह है.. कभी वो सजी हुई वैश्या सा बिछा है मेरे आगे.. और ये भी तूने देखा है, कैसै सुबह के सूरज सा जला है वो देखा है यह भी  बनारस के पाखंडी सा घूनी रमा और जो फिर हर रात वो गले में इतर, होंठ लाल कर एक नई कली मसलने चला.. देखा है तूने मुझे भी उसके सिर को रखा है गोद में एक माँ की तरह और परोसा है खुद को मैने भरे वॅक्षो से मेघ की तरह ए वक्त ,तू गवाह है वो बिछा है मेरे आगे, वेश्या की तरह.. मुड़ा ना वो, गुजरा जब मेरे  शामियाने से आगे, नज़रें बचा फिर भी गिरी उसकी निगाहें कनखियों से हमपर  के देख ना लूँ मैं कहीं उसके कुर्ते पर पड़े नयी कली के निशान.. मेरे खरीदार ने निभाये हैं किरदार कई, कभी मेरी तरह, कभी अपनी तरह... 5/1/2014