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Showing posts from 2020

जाड़ों जैसी, तेरी याद..

सर्दियों कि धुंधली सुबह सी तेरी याद  नम करती आँखें कुछ वैसे ही  कंपकंपाते होंठ और थरथराता जिस्म  वैसे ही जैसे, जाड़े कि सुबहों में  तुम भीगे हाथ लगते थे  और हँसते थे मेरे रूस जाने पर  और सर्द रातों सी ये तेरी याद  सुनसान रातों में किटकिटाते दांतों सी, खुद ही को देती सुनाई  गर्म साँसों को फूँकती और हथेली को करती गर्म  घिसती और टांगों के बीच छुपाती  ठंडी सी नाक और  खुश्क लब  और उनमे बसी, जाड़ों जैसी, तेरी  याद..

अधूरा

शाख से टूटे पत्ते आ कर मेरी गोद में गिरे थे, पीले, चुरमुरे, रंगमिटे से  आज उनमे से एक पत्ता किताब के पन्नो के बीच मिल गया, भूरा, चुरमुरा, अधूरा सा, ठीक वैसा ही ठहरा जैसे वो पल ठहरा है जब बारिष से पहले  ज़ोरों कि हवा में उलझ गयी थी मेरी लटें, और सुलझाने के बहाने तुमने गालों को छुआ था मेरे, हाँ, वो पल, वैसा ही है , मटमैला, चुरमुरा और अधूरा..

सलाहों का बंदरबाट

एक तो काले रंग में दाग वैसे ही नज़र नहीं आते और उसपर न्याय की मूर्ती को अँधा और बना दिया गया, की बस जनाब सालो साल खेलते रहिये आँख मिचोली और देखते रहिये बंदरबांट सलाहगारो और मददगारो के बीच, फिर अगर उस सलाह से कुछ मदद मिल जाए तो खुदा का शुक्र मनाइये और आपको बचाने वाले से जीवन भर की बची कुची बचत पर चपत लगवा कर बाकी वक़्त बिता लीजिये। निष्पक्ष और न्यायप्रिय ठेकेदार सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे चाहे आप कुछ भी कर लें, वे अपने साथ पक्षपात कभी नहीं होने देंगे और आपके पूर्वानुमान, अधकचरे ज्ञान को तारीखों की धीमी आंच पर तपा देंगे की आप पक्ष और विपक्ष का ही सही अनुमान लगाते रह जायेंगे। बस इसलिए वक़ालत नही कर पाए!