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Showing posts from July 23, 2017

बोझ

कभी यादों को बोझ होते देखा है? उन पत्तियों सी झुक जाती हैं जिनमे ओस भरी हो, सुबह सवेरे गिर जाती हैं जैसे रतजगी रोई हो, पर सुबह भी कभी कोई रोता है? अब हर कोई ना तुझसा है ना मुझसा, माँ कमरे में आ जाए तो झूठे मुँह आँख में ओस भर कर सोता है.. (माँ को पता ना चले, कई बार सिसकियाँ दबा कर भरी आँखों से सोने का नाटक किया है..)