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देखो न.. (2015)

देखो न, कुछ टूट सा गया है..
मेरा ख्याल भी, 
तुम्हारा दिन भर तंग करने का तरीका भी 
और वो गुलदस्ता 
जो चांदनी चौक में कुल्फी खाते वक़्त एक नज़र में भा गया था, 
और तुमने कनखियों से देख लिया था मुझे निहारते हुए, 
फिर बिना बोले कुछ, खरीद लिया, 
और मैंने भी कुछ ना बोला, रख लिया..
देखो ना, कुछ टूट गया है..

ठण्ड में अपने जैकेट में मेरे हाथ घुस लेने का तुम्हारा अंदाज़, 
ठंडी नाक देख कर झट सीने में घुसा लेने की आदत, 
फूक मार मार कर चाय पिलाने वाली बात 
और जनपथ की गलियों में पीठ पर लगाते हुए स्वेटर नापने की आदत..

देखो ना, यह चूड़ी भी चटक गई है,
अक्षरधाम के पुल पर गाडी रोक कर जो तुमने छल्ली और अमरुद खिलाए थे, 
छोटी सी लड़की जो चूड़ियां लेके आई थी, 
मोल भाव करके, तुमने मुझे पहनाई थी 
और फिर खुद ही दोनों हाथ पकड़ कर छनकाई थी
प्यार करते वक़्त, दोनों कलाइयों को भींचा कभी, 
दोनों हथेलियों को पकड़ कर गालों पर चूमा कभी,
देखो ना, कुछ टूट गया है,
तुम भी, मैं भी, तुम्हारा और मेरा साथ भी..

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