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हम नहीं हैं..

हम नहीं हैं अब भी मुस्कुराते हो?
उन अजीब शक्लों पर, अल्हड़ आवाज़ों पर
जो यूँ ही बनाती थी मैं तुम्हें हँसाने को
रोज़ सुबह उठाने को..
हम नहीं हैं, अब भी मुस्कुराते हो?
किचन से भुने पनीर के गायब होने पर
जो यूँ चुरा लेती थी और खाने को
तुम्हे चिढ़ाने को..
हम नहीं हैं, अब भी चिल्लाते हो?
हर छोटी बात पर, दिन या रात पर
जो मुझे रुला देते थे डराने को,
फिर चुप कराने को..
देखती हूँ तुमको, तुम अब भी वही हो
भर गई है मेरी कमी, है नज़र तुम्हारी ज़माने पर
जो चिढा देती है, रोने-हँसाने को
तुम्हे रूसा कर मनाने को..

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सलाहों का बंदरबाट

एक तो काले रंग में दाग वैसे ही नज़र नहीं आते और उसपर न्याय की मूर्ती को अँधा और बना दिया गया, की बस जनाब सालो साल खेलते रहिये आँख मिचोली और देखते रहिये बंदरबांट सलाहगारो और मददगारो के बीच, फिर अगर उस सलाह से कुछ मदद मिल जाए तो खुदा का शुक्र मनाइये और आपको बचाने वाले से जीवन भर की बची कुची बचत पर चपत लगवा कर बाकी वक़्त बिता लीजिये। निष्पक्ष और न्यायप्रिय ठेकेदार सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे चाहे आप कुछ भी कर लें, वे अपने साथ पक्षपात कभी नहीं होने देंगे और आपके पूर्वानुमान, अधकचरे ज्ञान को तारीखों की धीमी आंच पर तपा देंगे की आप पक्ष और विपक्ष का ही सही अनुमान लगाते रह जायेंगे। बस इसलिए वक़ालत नही कर पाए! 

अधूरा

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ऐ वक्त, तू गवाह है.. कभी वो सजी हुई वैश्या सा बिछा है मेरे आगे.. और ये भी तूने देखा है, कैसै सुबह के सूरज सा जला है वो देखा है यह भी  बनारस के पाखंडी सा घूनी रमा और जो फिर हर रात वो गले में इतर, होंठ लाल कर एक नई कली मसलने चला.. देखा है तूने मुझे भी उसके सिर को रखा है गोद में एक माँ की तरह और परोसा है खुद को मैने भरे वॅक्षो से मेघ की तरह ए वक्त ,तू गवाह है वो बिछा है मेरे आगे, वेश्या की तरह.. मुड़ा ना वो, गुजरा जब मेरे  शामियाने से आगे, नज़रें बचा फिर भी गिरी उसकी निगाहें कनखियों से हमपर  के देख ना लूँ मैं कहीं उसके कुर्ते पर पड़े नयी कली के निशान.. मेरे खरीदार ने निभाये हैं किरदार कई, कभी मेरी तरह, कभी अपनी तरह... 5/1/2014