Sunday, 26 November 2017

तुझे बहकना होगा

उसकी गर्दन से चिपकी लट को छुड़ाया हमने,
पेशानी से टपकती खारी बूँद को चुराया हमने,
फिर मुझे सोच में सिमटना होगा,
वो ख्वाब है, उसमे बहकना होगा..
मैं रेशम सी सिलवटें कुछ उसपर बना दूँ,
उसके कंगन में उलझे धागे हटा दूँ,
गर्म साँसों से अपनी जो उनको भिगाया हमने,
सिरहन से उनके रोम को उभरना होगा,
वो ख्वाब है, उनमे बहकना होगा..
दाँतों से कतर देती है उँगलियाँ अपनी,
होंठो से खींच लेती है परतें कितनी,
बिखरा के बालों को, फिर यूँ ही बाँध लेती हैं
कई बार खुद को बालों सा बिखराया हमने,
पेशानी से टपकती बूँद को चुराया हमने,
फिर तुझेे सोच में सिमटना होगा,
तू ख़्वाब बन, मुझे बहकना होगा...
- हिमाद्रि

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