Sunday, 26 November 2017

हक़ीक़त हूँ मैं

कुछ अच्छा लिखो तो हम पढ़ें भी,
यूँ ही कलम टटोलते रहते हो जैसे मेरी पीठ पर उंगलियो से लिख रहे हो।
कुछ अच्छा कहो तो हम सुने भी,
यूँ ही बुदबुदाते रहते हो जैसे सीने से लगा कर कानों में कुछ कह रहे हो।
ऐसे थोड़े ही होता है, कुछ अच्छा सा सुना दो,
हर वक़्त क्या एक ही ग़ज़ल गुनगुनाते हो की मैं हंस दूँ।
हटो, छोडो मुझे, ज़रा मुझसे बहार आओ
हकीकत हूँ मैं, तुम्हारा ख़याल नहीं...

1 comment:

  1. You have a good point here!I totally agree with what you have said!!Thanks for sharing your views...hope more people will read this article!!!
    DLF park place

    ReplyDelete