Monday, 5 December 2016

तुझसे बेहतर है, मुझपे हंसने वाले

दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटाने वाले
मैंने देखे हैं कई रंग बदलने वाले

तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझ पर
तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हँसनेवाले

मैं तो इख़लाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकनेवाले

(अख़लाक़ = इख़लाक़ = शिष्टाचार, सद्वृत्ति)

आख़री बार सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर ले लो
फिर ना लौटेंगे शब-ए-हिज्र पे रोनेवाले

[(मुज़्तर = व्याकुल, बेचैन, बेबस, लाचार) (सलाम-ए-दिल-ए-मुज़्तर = व्याकुल दिल का सलाम), (शब-ए-हिज्र = जुदाई की रात)]

-सईद राही

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