Monday, 28 November 2016

हम नहीं हैं..

हम नहीं हैं अब भी मुस्कुराते हो?
उन अजीब शक्लों पर, अल्हड़ आवाज़ों पर
जो यूँ ही बनाती थी मैं तुम्हें हँसाने को
रोज़ सुबह उठाने को..

हम नहीं हैं, अब भी मुस्कुराते हो?
किचन से भुने पनीर के गायब होने पर
जो यूँ चुरा लेती थी और खाने को
तुम्हे चिढ़ाने को..

हम नहीं हैं, अब भी चिल्लाते हो?
हर छोटी बात पर, दिन या रात पर
जो मुझे रुला देते थे डराने को,
फिर चुप कराने को..

देखती हूँ तुमको, तुम अब भी वही हो
भर गई है मेरी कमी, है नज़र तुम्हारी ज़माने पर
जो चिढा देती है, रोने-हँसाने को
तुम्हे रूसा कर मनाने को..


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