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Showing posts from 2016

कुल्लड़ की चाय..

चंद चुस्कियाँ चाय की हलकी, सर्द शाम में यूँ ही बेवजह बैठे कहीं छोड़ सारे काम मैं आ जाती झूठ बोल कर जब भी तुम बुलाते थे एक कुल्लड़ चाय पर हँसते हंसाते थे.. तुम हो नहीं, आदत दिला गए एक कुल्लड़ चाय की हुड़क सिखा गए हैं चंद चुस्कियाँ चाय की हलकी, सर्द शाम मे वक़्त यूँ ही निकल जाता है चाय में, और काम में..

वो ख्वाहिशों में क्या चाहता है

बैठ सामने मैं हँस देती हूँ ज़िन्दगी के, यूँ हर शख़्स मेरी ज़िन्दगी बनना चाहता है, हँसने से नहीं पड़ी लकीरें मेरे चहरे पर, वो चादरों की सिलवट बनना चाहता है, मुगालतों से भरी कुछ ख़्वाहिशें सबकी, मैं जानती हूँ वो ख्वाहिशों में क्या चाहता है, तू भी सही, तू भी सही और तू भी सही, वो सब ग़लत कर, ठीक होना चाहता है, मैं जानती हूँ उन ख्वाहिशों को, हर शख़्स मेरी ज़िन्दगी बनना चाहता है..