Friday, 23 October 2015

Parinay

और मेरा आमलेट?
वो भी मैं खा गया..
हॉ!! गंदे.. क्यों किया?
तुम मुझे खा लो न..
यह सुन कर मैं मुस्कुरा दी.. "मतलब.. कुछ भी?"
हा हा हा.. नहीं सच कह रहा हूँ, मुझे खा कर देखो, अंडे का टेस्ट आएगा..
दूर हटो! और मैं किचन में चल दी, मुझे मालूम था शनिवार की छुट्टी और सारा दिन ना कबीर को कुछ करना है ना मुझे कुछ करने देना है, सारा दिन यूँ ही बाते बना कर निकाल देंगे और खुद को सुपरमैन समझ कर लास्ट मिनट एन्ट्री करेंगे..
सुनो..
हाँ गुलबदन कहो?
यह गुलबदन क्या होता है अब, क्या क्या बुलाते रहते हो.. कल रात तो मैं गुलाबो थी?
कल रात तुमने लाल लिपस्टिक लगाई थी अभी तुमने कुछ नहीं लगाया, और रात की लाली हलकी सी है तो गुलाब का बचा हुआ "गुल" और तुम्हारा बदन.. यह कह कर कबीर ने फिर मुझपर लपकने की कोशिश की..
मैंने माथा पीट लिया, लेक्सिकल इंटरप्रिटेशन की थीसिस मेरी है और अर्थ का अनर्थ तुम करते हो!!
सीने पर हाथ रख कर पीछे धकेलते हुए मैं बोली "क्या चाहिए?"
"बेटी"
"धत्त!!" कह कर मैं हंस दी..
"अरे सच। तुम्हारे जैसी, मोटे गालो वाली, थोडी पर तिल वाली, मोटे मोटे होंठ.. बत्तख की तरह चलने वाली.. छोटे छोटे हाथ.. देदो ना.." कह कर कबीर ने गले में गुदगुदी कर दी..
हाहाहाहा.. दूर हटो और छोडो मुझे!! दीवाली आ रही है.. भाभी का फ़ोन आया था, घर बुला रही हैं इस बार..
और कबीर ने मुझे छोड़ दिया..
"हैं? छोड़ क्यों दिया?"
"अरे तुमने ही तो कहा 'हटो दूर, छोड़ो मुझे' नेरी आवाज़ बनाते हुए कबीर ने चिढ़ाया..
"च्च!! तो मेरा मतलब वो थोड़ी ना था, लिट्रेलि छोड़ने का.. पकड़ो फिर ठण्ड लग रही है"
" तुम औरतों का भी ना कुछ समझ नहीं आता, कर दो तो दिक्कत, ना करो तो दिक्कत.." कहते हुए कबीर ने बाहों में फिर से भर लिया..
देखो जी, औरतों को ब्रह्मा भी नहीं समझ पाए, तुम तो फिर भी एक मामूली से बैंकर हो..
और इस बैंकर की बैंकरानी तुम!
अब यह बैंकरानी क्या होता है?
पति-पत्नी : बैंकर - बैंकरानी!
बैंकरनी होना चाहिए ना ? मैंने हँसते हुए कहा..
वाह मेरी पीएचडी!! कबीर हंस पड़ा अच्छा तुम कुछ कह रही थी.. ठण्ड लग रही है..?
हाँ!
मैं तुम्हारा अपना पर्सनल हीटर मेरी छिप.. अनारकली!!
क्या??
कुछ नहीं!! वो ठंडी?? और कबीर दांत दिखा के हंसने लगा
हाँ, ठंडी! ऊपर से सूटकेस उतरने हैं, तुम्हारी गर्म टीशर्ट के लिए, मौसम बदल रहा है फिर सर्दी होगी.. जाओ ना.. उतार दो..
तुम हो ना हीटर!! तुम्हे पहन लूँगा!!
मार खाओगे अब.. काम करो कुछ, ऑमलेट भी खा गए, मुंह बनाते हुए मैंने कहा..
तुम हाथ उठाओगी मुझपर? मैं पति परमेश्वर हूँ तुम्हारा, सेवा करो मेरी और एक कप चाय और बनाओ.. समझी औरत??
जाते हो की मैं ही उतारूँ?
जा रहा हूँ बीवी.. और गुनगुनाते हुए कबीर कमरे में चला गया.. "ज़माना तो है नौकर बीवी का.. "