Saturday, 9 May 2015

"परिणय" #8815


महज़ इत्तेफ़ाक़ था शायद उन्होंने आज ये बात छेड़ दी, "मैं आज भी नफरत करता हूँ उससे" किचन से बहार आते वक़्त मैंने हाथ पोंछ कर तौलिया डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ही टांग दिया।
"क्यों बुरा सोचते हो बीती बातों का, जाने दो, क्या फायदा होगा?" कहते हुए पीछे से उसके काँधे पर सर रख दिया मैंने।
"हम्म ठीक कह रही हो, एक ग्लास पानी पिला दो" और उन्होंने AC चला दिया, "गज़ब की गर्मी है भाई, वापस कब जाना है तुम्हे?"
मैं कुछ बोली नहीं, मैं जाना ही नहीं चाहती थी, कहने का मन तो यह था की बोलू चलो ना पहाड़ों पर छुट्टी चलें, पूरा साल भर से ज्यादा हो चुका है,"कबीर, दफ्तर में सब कैसा है?"
"ठीक ही है, काम बहुत ज्यादा रहता है"
"हम्म"
"तुम वापस कब जा रही हो?"
"बता दूँगी.. अभी हूँ यहाँ"
"हम्म"
काफी देर एक ख़ामोशी ने घेर लिया उसके बाद हम दोनों को, माहौल काफी गंभीर हो चुका था बीती बातों के बाद, मैंने सोचा मैं ही बातों को घुमा दूँ, कबीर टीवी के चैनेल्स बदलने में लगे थे
मैंने शरारत सोची और बर्फ का एक टुकड़ा निकल लाइ फ्रिज में से..
पीछे से उनकी शर्ट में डालने ही लगी थी की उन्होंने हाथ पकड़ लिया..
"अच्छा बेटा.. शैतानी करेगा?.."
मैं हंस दी.. और बर्फ को अपने मुंह में डाल लिया।
कबीर ने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा मुंह दबा दिया की मैं बर्फ निकाल दूँ।
मैं हंस भी रही थी और मुंह भी भींचे हुई थी क्योंकि मुझे पता था एक बार उनके हाथ बर्फ आ गई तो बस मुझे गुदगुदी कर कर के रुला देंगे..
भला हो पिज़्ज़ा वाले का टाइम पे आ गया, वरना आज शामत थी, कबीर को छेड़ने का मतलब है, बस सोने नही देते वो सज़ा के तौर पर..

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