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Showing posts from August 31, 2014

शब्-ए-इश्क

वो हवा - मैं पानी, देखा और इश्क हो गया.. दोनों जवां - शाम रंगीं बोतल से हम दोनों खुले और इश्क़ , झाग सा चढ़ गया.. एक कदम - दूजी जुबां संग चलने का वादा किया करते गए, लड़ते गए.. वो हवा - मैं पानी था रिश्ता बुलबुलों सा ना रुकी जुबाँ, फलसफा चलता रहा चले संग कदम पर फासला बढ़ता गया.. बुलबुलों का झाग जब बैठा नजर आई फिर अधूरी "शब्-ए-इश्क" की बोतल था हवा वो -पानी मैं बोतल से खुले थे हम दोनों मैं ना जाने कहाँ बह गयी और आधा वो खाली सा रह गया..