Friday, 5 September 2014

शब्-ए-इश्क

वो हवा - मैं पानी,
देखा और इश्क हो गया..
दोनों जवां - शाम रंगीं
बोतल से हम दोनों खुले
और इश्क़ ,
झाग सा चढ़ गया..
एक कदम - दूजी जुबां
संग चलने का वादा किया
करते गए, लड़ते गए..
वो हवा - मैं पानी
था रिश्ता बुलबुलों सा
ना रुकी जुबाँ,
फलसफा चलता रहा
चले संग कदम
पर फासला बढ़ता गया..
बुलबुलों का झाग जब बैठा
नजर आई फिर अधूरी
"शब्-ए-इश्क" की बोतल
था हवा वो -पानी मैं
बोतल से खुले थे हम दोनों
मैं ना जाने कहाँ बह गयी
और आधा वो खाली सा रह गया..

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