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ना तुम मुस्कुराते ना वो बात होती

चलो ना, फिर उस बारिश में लबों को चूम लें
मैं फिर घुटनों पर बैठ कर मांग लूंगी तुम्हें, और तुम हाँ की जगह मुझे भर लेना बाहों में..
चलो ना, मुस्कुरा दो फिर से, जैस मेरे रूठ जाने पर गुदगुदी करके मुझे हंसाते थे, और जो मैं हंस के रो देती तुम्हारे सीने से लिपट कर, तुम बस मुस्कुरा देते..
चलो ना, फिर से दौड़ कर वो छूटती बस को पकड़ें और हंस दे चढ़ती सासे देख, मुझे खड़े देखे तुम्हारे इंतज़ार में तुम गाड़ी तेज़ भगा लेते..
चलो ना, फिर से जियें बस एक दूजे के लिए.. बिना परवाह किए किसी की, तुम भी वो हो मैं भी वो हूँ बस अब खुद को मना लेते..
अच्छा चलो कान पकड़ लें, मैं तुम्हारे और तुम मेरे, दिल दुखाया जो एक दूजे का उसपर मुस्कुरा कर मरहम फेरें..
..एक बार तो फिर से बाहों में भर कर देखो, सब कुछ सिफ़र होजाएगा, तुम ऐसे दूर जाओगे तो मुझको कौन खिलायेगा?
चलो ना, फिर से दर्द महसूस करें एक दूजे का, फिर जिंदगी का मकसद बन जायें, पूरा करो ना वो रूठी कहानी, या मिल कर एक ग़ज़ल हो जायें..
चलो ना, एक बार फिर से मेरा सपना देखो, मैं फिर हंस कर काँधे पर सर रख देती, तुम फिर यूँहीं गुनगुना के हंस देते.. "ना तुम मुस्कुराते ना वो बात होती" …

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सलाहों का बंदरबाट

एक तो काले रंग में दाग वैसे ही नज़र नहीं आते और उसपर न्याय की मूर्ती को अँधा और बना दिया गया, की बस जनाब सालो साल खेलते रहिये आँख मिचोली और देखते रहिये बंदरबांट सलाहगारो और मददगारो के बीच, फिर अगर उस सलाह से कुछ मदद मिल जाए तो खुदा का शुक्र मनाइये और आपको बचाने वाले से जीवन भर की बची कुची बचत पर चपत लगवा कर बाकी वक़्त बिता लीजिये। निष्पक्ष और न्यायप्रिय ठेकेदार सदैव आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे चाहे आप कुछ भी कर लें, वे अपने साथ पक्षपात कभी नहीं होने देंगे और आपके पूर्वानुमान, अधकचरे ज्ञान को तारीखों की धीमी आंच पर तपा देंगे की आप पक्ष और विपक्ष का ही सही अनुमान लगाते रह जायेंगे। बस इसलिए वक़ालत नही कर पाए! 

अधूरा

शाख से टूटे पत्ते आ कर मेरी गोद में गिरे थे, पीले, चुरमुरे, रंगमिटे से  आज उनमे से एक पत्ता किताब के पन्नो के बीच मिल गया, भूरा, चुरमुरा, अधूरा सा, ठीक वैसा ही ठहरा जैसे वो पल ठहरा है जब बारिष से पहले  ज़ोरों कि हवा में उलझ गयी थी मेरी लटें, और सुलझाने के बहाने तुमने गालों को छुआ था मेरे, हाँ, वो पल, वैसा ही है , मटमैला, चुरमुरा और अधूरा..

ए वक्त ,तू गवाह है

ऐ वक्त, तू गवाह है.. कभी वो सजी हुई वैश्या सा बिछा है मेरे आगे.. और ये भी तूने देखा है, कैसै सुबह के सूरज सा जला है वो देखा है यह भी  बनारस के पाखंडी सा घूनी रमा और जो फिर हर रात वो गले में इतर, होंठ लाल कर एक नई कली मसलने चला.. देखा है तूने मुझे भी उसके सिर को रखा है गोद में एक माँ की तरह और परोसा है खुद को मैने भरे वॅक्षो से मेघ की तरह ए वक्त ,तू गवाह है वो बिछा है मेरे आगे, वेश्या की तरह.. मुड़ा ना वो, गुजरा जब मेरे  शामियाने से आगे, नज़रें बचा फिर भी गिरी उसकी निगाहें कनखियों से हमपर  के देख ना लूँ मैं कहीं उसके कुर्ते पर पड़े नयी कली के निशान.. मेरे खरीदार ने निभाये हैं किरदार कई, कभी मेरी तरह, कभी अपनी तरह... 5/1/2014