Sunday, 23 March 2014

गरीबी - एक धर्म

पापा और मैं सन्डे की नाश्ते की टेबल पर बहुत बातें करते हैं। कल रात डायरेक्ट साब ने बातों ही बातों में एक सवाल पूछ डाला की भारत को इंडिया क्यूँ कहते हैं। अपने सूक्ष्म ज्ञान के अनुसार जो अधकचरा उत्तर मैंने उन्हें दिया उससे मैं खुद ही संतुष्ट न हो पाई तो सुबह सुबह अपने इतिहास प्रेमी पिता से पूछ डाला।

मेरा उत्तर लगभग सही था अंग्रेज और सिन्धु नदी।
खैर.. बात घूमते घूमते पहुँच गयी कनाट प्लेस के कुत्तों की सेहत पर और वहां से पापा ने शेयर किये उनके कुछ मार्मिक अनुभव -कलकत्ता, असम, दिल्ली, और कुछ शहरों के जहाँ उनकी पोस्टिंग रही।

वैसे तो इस बात को 30-40 साल से ज्यादा हो गए लेकिन आज भी हकीकत ही है, देखा तो मैंने भी है और मुझे यकीन है आपने भी।

कलकत्ता और मदर टेरीसा की कुछ बात  बताते हुए पापा ने बताया की एक साइकिल पर होटलों से बचा ठीक खाना और साफ़ जूठन गरीबों के लिए ले जाया जाता था जो की आज भी होता है।
उनकी आँखों देखी बात है की बड़े कूड़े के ढेर में से ठेकेदार खाना साफ़ करवा कर बेचा करते थे जिसमे सभी तरह का मांस होता था - मुर्गा, बकरी, गाय, भैंस और शूकर।
गरीब लोग आते और चंद पैसो वही ले जाते और खाते।
गरीब से मेरा मतलब ये नहीं जो घर में दाल रोटी खाते हैं या केजरीवाल के आम आदमी वेशभूषा में रहते हैं, मैं उनकी बात कर रही हूँ जो किसी फ्लाईओवर क नीचे कुत्ते के मूंह से रोटी छीन कर खाते हैं, मैंने भी देखा है।

लेडी श्री राम कॉलेज की मेरी एक मित्र थी जो आज अमरीका में शादी कर चुकी है उसके लिए हौंडा सिटी चलाने वाला गरीब था और मेरे लिए शायद पैदल चलने वाला गरीब हो क्यूंकि मैं खुद डीटीसी की बस और मेट्रो में रोज़ सफ़र करती हूँ और लाल बत्ती की गाडी में भी, और पैदल चलने वाले के लिए शायद भिखारी गरीब हो। सबके अपने पैमाने हैं

लेकिन यहाँ सोचने वाली बात एक थी, मैंने हिन्दू परिवार में जन्म लिया है, हालांकि मैं किसी धर्म को नहीं मानती, लेकिन खान पान में परहेज रखना डंडे के जोर पर  मेरी ब्राह्मण माँ करवातीं हैं पर उस इंसान को धर्म से क्या जो कूड़े में पड़े मांस के टुकड़े पर अपना जीवन व्यतीत करता है?
वो सिर्फ एक धर्म निभाता है - भूख
गरीबी भी तो एक धर्म ही है, और हम चाहे कितने गाँधी , मोदी, और केजरीवाल बदल लें भारत का एक बहुत बड़ा तबका गरीब ही रहेगा जिन्हें देख कर हम मुंह पर रुमाल रखेंगे और अनदेखा कर देंगे।
या अगर वो ऑटो में हमें छु कर पैसे मांगे तो गाली दे कर हम डेटोल सैनेटाईज़र लगायेंगे।

खैर, 30%  डैरेक्ट टैक्स और 70% इंडाइरेक्ट टैक्स देकर हम अपनी सामाजिक जिम्मेवारी पूरी कर रहे हैं और वो मेरी बात का विषय नहीं है

मेरी सोच और सवाल केवल एक बिंदु पर केन्द्रित है
क्या धर्म केवल उनके लिए है जो barbeque nation में unlimited खाना मंगवा कर बर्बाद करते है या उनका भी है जो उसी बर्बाद खाने और जूठन से अपनी भूख मिटाते हैं?
वो जनेऊ पहनते हैं की ख़तना करवाते हैं? आग पूजते हैं की मोमबत्ती जलाते हैं? सेवा करते हैं या कन्या पूजते हैं?

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