Thursday, 13 February 2014

"कागज़, कलम, स्याह - तू











महज़ एक ख़्याल ही तो है तू,
धुंधला, कोसा, मखमली,
कभी भंवरे की तरह मंडरा जता है,
कानों की पास,
कभी झगड़ता है हवा सा,
बालियों से सटी लटों साथ,
है महज़ एक ख़्याल, तू

है स्याह काली रातों की कहानी
चादार पर पड़ी सिलवटों की ज़ुबानी
कभी तकिये पर नॅम दाग सा
कभी भीगे मल्हार राग सा,

है महज़ एक ख़्याल तू,
मेरा कागज़ , कलम, स्याह,  तू
लिपट जाती हूं हर लफ्ज़ मैं ऐसे
जैसे तुझे लिखा हो,
है आसरा बाहों का तेरी
जैसे तुझे पढ़ा हो,

महज़ एक ख़्याल ही तो है तू
कागज़ पर बिखरा
कभी गलत, तो सुर्ख लाल सा
कभी सही, मेरे सवाल सा
दराज़ में एक किताब है
किताब में सूखे गुलाब सा
है महज़ एक ख़्याल तू

मेरा कागज़, कलम, स्याह - तू