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Showing posts from 2014

कोई बेसबब होता तो क्या बात थी"

कोई बेसबब होता तो क्या बात थी" तू कुछ अलग होता तो क्या बात थी बे-माना बे-मतलब होता तो क्या बात थी हम तो आए तेरी बाँहों में, की मौका-परास्त है ये क़ातिल दुनिया, तू सबसे छुपा कर क़त्ल ना करता तो क्या बात थी तू बे-मतलब होता तो क्या बात थी.. हम भी मुस्कुरा दिए खुदा तेरी बिसात पर कोई चाल तू नई चलता तो क्या बात थी.. दर्द दे दे कर, इस दिल को किया बे-दर्द, बस एक जिस्म भी मर्द सा देता तो क्या बात थी.. मैं क्या जवाब दूं तेरे इज़्हार-ए-मुहोब्बत का? इक़रार-ए-मुहोब्बत का रास्ता है दिल से लबों तक, लहू-लुहान ना करते जुबाँ को ये नासूर तो क्या बात थी, बस एक तू ना होता मेरे कातिलों की फेहरिस्त में शामिल और होता तो होता सीने पर तेरा वार, तो क्या बात थी.. तो क्या बात थी..

बस एक पल

एक पल तेरे काँधे से सर टिकाया था अभी, एक पल जिए थे हम सुकून-ए-कहकशाँ बन के, एक पर तेरी यादों से की अठखेलियाँ, एक पल मरे हम बाकायदा मर के, ये फालसा भी क्या फासला हुआ, एक पल रुक गया खिजाँ बन के, गर्दिश में किरकिरी सी भटकी हूँ मैं एक पल थम गयी मैं तेरे अश्कों में भरके, कल सुबह फिर बहम* होंगे हम दोनों, एक पल बीत गया फिर यही उम्मीद करके.. ..एक पल बीत गया फिर यही उम्मीद करके.. *बहम = इकठ्ठा

शब्-ए-इश्क

वो हवा - मैं पानी, देखा और इश्क हो गया.. दोनों जवां - शाम रंगीं बोतल से हम दोनों खुले और इश्क़ , झाग सा चढ़ गया.. एक कदम - दूजी जुबां संग चलने का वादा किया करते गए, लड़ते गए.. वो हवा - मैं पानी था रिश्ता बुलबुलों सा ना रुकी जुबाँ, फलसफा चलता रहा चले संग कदम पर फासला बढ़ता गया.. बुलबुलों का झाग जब बैठा नजर आई फिर अधूरी "शब्-ए-इश्क" की बोतल था हवा वो -पानी मैं बोतल से खुले थे हम दोनों मैं ना जाने कहाँ बह गयी और आधा वो खाली सा रह गया..

के ये सफ़र अब ख़तम हो चला है..

बस कुछ देर और जी भर के देख लीजिये हमें जानिब, के ये सफ़र ख़तम सा हो चला है चंद लम्हों में जो समेट सको सुकून को, बस सीली हवा सा तेरा हमसफ़र हो चला है.. बड़ा टूटे थे तेरे इश्को को पाने में, टूटे दिल का मर्ज़ हो चला है.. कई ख़्वाबों को रख के बुनी थी जयमाला तुम्हारी, उन्ही ख़्वाबों की बन चादर, तेरी दुल्हन का जनाज़ा निकला है.. बस कुछ और जी भर के देख लीजिये जानिब, के हमसफ़र से फासलों का फलसफा, और कुछ बेआबरू से वादों का कारवां तेरे ही दर से रुख्सत हो चला है..

ना तुम मुस्कुराते ना वो बात होती

चलो ना, फिर उस बारिश में लबों को चूम लें मैं फिर घुटनों पर बैठ कर मांग लूंगी तुम्हें, और तुम हाँ की जगह मुझे भर लेना बाहों में.. चलो ना, मुस्कुरा दो फिर से, जैस मेरे रूठ जाने पर गुदगुदी करके मुझे हंसाते थे, और जो मैं हंस के रो देती तुम्हारे सीने से लिपट कर, तुम बस मुस्कुरा देते.. चलो ना, फिर से दौड़ कर वो छूटती बस को पकड़ें और हंस दे चढ़ती सासे देख, मुझे खड़े देखे तुम्हारे इंतज़ार में तुम गाड़ी तेज़ भगा लेते.. चलो ना, फिर से जियें बस एक दूजे के लिए.. बिना परवाह किए किसी की, तुम भी वो हो मैं भी वो हूँ बस अब खुद को मना लेते.. अच्छा चलो कान पकड़ लें, मैं तुम्हारे और तुम मेरे, दिल दुखाया जो एक दूजे का उसपर मुस्कुरा कर मरहम फेरें.. ..एक बार तो फिर से बाहों में भर कर देखो, सब कुछ सिफ़र होजाएगा, तुम ऐसे दूर जाओगे तो मुझको कौन खिलायेगा? चलो ना, फिर से दर्द महसूस करें एक दूजे का, फिर जिंदगी का मकसद बन जायें, पूरा करो ना वो रूठी कहानी, या मिल कर एक ग़ज़ल हो जायें.. चलो ना, एक बार फिर से मेरा सपना देखो, मैं फिर हंस कर काँधे पर सर रख देती, तुम फिर यूँहीं गुनगुना के हंस देते.. "ना तुम मुस

कुछ यूँ भी

सिर्फ एक तेरे सीने पर सर रख रात बिताने के लिए, मुहोब्बत भी की, बगावत भी की, कुछ दर्द सहा, इबादत भी की, फिर मर भी गए वादों की तरह.. ..के जनाज़े के बहाने जो तू छू ले ..तो फिर जी उठेंगे हम यादों की तरह.. :)

बरस

जो बरस सके तो कुछ ऐसे बरस रे मेघा,  जैसे पी मोरा तन छू जाए,  नाभी पर चुपके से मोरी,  चूमे और सिहरन दे जाए,  बूंद नीर पग झांझर बांधे,  वक्षों पर मोरे थिरकाए,  अंग अंग मोरा बनके मयूरा रसिका सा पी का मन भाए,  जो बरस सके तो ऐसे बरस लीजो प्रणय मिलन मेध अरू धरा का जो पी देखे तो रोक न पाए बिसर के अपनी चाक-चाकरी थामे चूनर - उर मोरा लजाए कर निर्वस्त्र पी के यौवन को ताप-श्वास मुझमे समाए कर मुझे तू उसकी राधिका  कान्हा वो मेरा हो जाए,  जो बरस सके तो बरस रे मेधा जो पी से मिले मेरा देह बरस जाए,  प्रफुल्ल मनु मनमीत मिलन हो नूतन प्रेम अंकुरित हो जाऐ कर मुझको तुझ सा बावरा मै बरसूं और पी मुझमें रमाऐ..

तू आदत है वो..

तो क्या हुआ जो हर रात तेरे बिस्तर पर बिछी हूँ मैं मैंने भी हर रात तुझे चादर सा ओढ़ा है तेरी अँगड़ाई, तेरी खुशबू, यूँ ही रह जाती हैं हर सुबह मेरी सिलवटों में जिन्हें तूने छोड़ा है बड़ा खाली सा रह गया है ये वक्त, जब 'खुद को' तुझे परोसा करते थे, हाँ, हुई होगी तुझे कभी मुहोब्बत, पर तूने मुझे एक 'आदत' बनके तोड़ा है।

"कागज़, कलम, स्याह - तू

महज़ एक  ख़्याल  ही तो है तू, धुंधला, कोसा, मखमली, कभी भंवरे की तरह मंडरा जता है, कानों की पास, कभी झगड़ता है हवा सा, बालियों से सटी लटों साथ, है महज़ एक  ख़्याल , तू है स्याह काली रातों की कहानी चादार पर पड़ी सिलवटों की ज़ुबानी कभी तकिये पर नॅम दाग सा कभी भीगे मल्हार राग सा, है महज़ एक  ख़्याल  तू, मेरा कागज़ , कलम, स्याह,  तू लिपट जाती हूं हर लफ्ज़ मैं ऐसे जैसे तुझे लिखा हो, है आसरा बाहों का तेरी जैसे तुझे पढ़ा हो, महज़ एक  ख़्याल  ही तो है तू कागज़ पर बिखरा कभी गलत, तो सुर्ख लाल सा कभी सही, मेरे सवाल सा दराज़ में एक किताब है किताब में सूखे गुलाब सा है महज़ एक  ख़्याल  तू मेरा कागज़, कलम, स्याह - तू