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Showing posts from September 15, 2013

आधी किलो मुहोब्बत

"मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." ऐ लडकी? कैसी दी ये मुहोब्बत? ले लो साब, ताजी है, बीवी को देना, बहन को देना, बेटी को देना, सच्ची है.. हुंह, नही-नही, ये तो उसके लिए है.. ला! ज़रा आधा किलो देदे.. बाबूजी मुस्कुराते हुए, थैली घुमाते, आखों से ओझल हो गए ओर वो फिर चौराहे पर.. "मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." ए लड़की, भाग यहां से.. नेता जी की रैली है. नेता की रैली? फिर तो आज सारी मुहोब्बत बिक जाएगी.. रहने दो ना थानेदार साब, मेरी मुहोब्बत बिक जाएगी.. जनता: "नेता जी अमर रहे.. जब तक सूरज चांद रहेगा, नेता जी का नाम रहेगा. मै: नेता जी "मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." नेताजी : बिलकुल, तुम देश का भविष्य हो.. हम मार्गदर्शन कर्ता हैं, पिता है. जनता हमारी संतान है.. सुनो बिटिया, ये सारी मुहोब्बत सरकारी कोष में डाल दो.. सरकारी कार्यवाही के बाद तुम्हें तुम्हारा हक मिलेगा.. भीड़ मे चुपचाप निकल ली, और मंदिर की सीढ़ी पर थक कर बैठ गई.. "मुहोब्बत ले लो.. मुहोब्बत...ता.." अरे पगली, प्यार बोल प्यार.. क्यों अम्म