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Showing posts from July 21, 2013

तुम

तुम, श्याम हो, उस मेघ से, जो धरा के अधरों पर बरसता है! तुम, सिंदूरी हो, उस शाम से, जो भोर के आलिंगन को तरसता है! तुम, पैरों की पायल की वो खनक हो, लुका-छुपी में जो हरा दे, तुम, सुबह की चादर का वो सिलवट हो, जो बीती रात का गीत गुनगुना दे, तुम, अदा हो, जो मेरे काजल में कैद हो, मुसकुरा दे! © हिमाद्री