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Showing posts from June 30, 2013

हर बार

हर बार.. हर बात पर पूछ लिया "कोइ और तो नही" कभी तो अपने नश्तर-ए-अलफाज़ देखता, हर बात पर कह दिया "तू सिरफिरा है" कभी तो मेरा जुनून-ए-मुहोब्बत देखता तुझे देखा नंगी ऑखो से मैने इश्क को तमाचा जमाते हुए मेरी हथेली पर खिंचे हमसफर तेरी हथेती के सुर्ख निशां तो देखता, हर बात पर पलट बैठा पुराने पन्नो के हिसाब हर पन्ने पर लिखा अपना नाम तो देखता हर बात पर भर लेती हूं सिस्कीयां, यह इल्ज़ाम है तेरा, हर सिस्की में भरी सांस के पैगाम देखता, जा, कर दिया आज़ाद तुझे मुहोब्बत की उल्झनो से हर बात पर खिसकती रेत का सैलाब तो देखता हर बार ज़ख्म दे कर छोड़ दिया यूं ही, हर बार के दर्द की तासीर तो देखता, हर बात पर पूछ लिया "कोइ और तो नही" कभी झांक कर अपना गिरेबां देखता, कभी खुद ही का अंदाज़-ए-बयां देखता.. ©हिमाद्री