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Showing posts from May 12, 2013

तेरी बाहों का आसरा..

बिखर जाती हूँ मैं, हर एक शब्द में ऐसे, जैसे तेरी बाहों का, आसरा मिल गया हो, जब भी लिखती हूँ, कहानी तेरे लफ़्ज़ों की, हंसती है ख़ामोशी, जैसे ज़र्रा हिल गया हो, कलम थिरकती है मेरी, स्याह करने कागज़ के बदन को, देख किस्सों की अंगडाई जैसे, बारिश का समां हो, वो हंसती है, रिझाने तुझको, झांके कभी सिरहाने से, वो किरदार है मेरी कलम की , फिर मांगे क्यूँ साँसे, तुझ बेपरवाह दीवाने से? चल हट! मुझसे ना कर बातें ऐसी, इश्क तुझे हो गया हो,  बिखर न जाऊं शब्दों में ऐसे, जैसे तेरी बाहों का मुझे  आसरा मिल गया हो…  - हिमाद्री 

काश फिर मिलने की वो वजह मिल जाये

काश फिर मिलने की वो वजह मिल जाये, तेरे संग बिताये वो पल मिल जाये  बातों बातों में जो बालियाँ कानो की खींची थी, रोई थी जब मैं, गीली आँखे मींची थी, कान पकड़ कर वैसे फिर से मुझे मनाये, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए, पुलिया पर लटकते हमारे पाँव, सपनो की दुनिया का चक्कर लगाते, चूंटी काट फिर तुम मुझे, वापस यहीं ले आते थे, कब, कैसे, बादलों की गुडिया बना देते तुम, जो पूंछू मैं, तो मुंह बना देते थे, वो बादलों की गुड़िया मिल जाये, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए …  आज कमर से भी लम्बी है मेरी चोटी , पर खींचने वाले तुम नहीं, देखती हूँ तुमको कभी, छुप कर, यूँ ही, पर बचपन वाला यूँ नहीं, कद बड़ा तो बढ़ गए फासले भी , न कच्ची कैरियां, ना वो त्योरियां अब, कान की बालियाँ कभी जो खिंच जाए, वो सिसकियाँ कहे, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए ...