Tuesday, 23 July 2013

तुम

तुम,
श्याम हो,
उस मेघ से,
जो धरा के अधरों पर बरसता है!
तुम,
सिंदूरी हो,
उस शाम से,
जो भोर के आलिंगन को तरसता है!
तुम,
पैरों की पायल की वो खनक हो,
लुका-छुपी में जो हरा दे,
तुम,
सुबह की चादर का वो सिलवट हो,
जो बीती रात का गीत गुनगुना दे,
तुम,
अदा हो,
जो मेरे काजल में कैद हो, मुसकुरा दे!

© हिमाद्री

1 comment:

  1. wow,,ye mast hai,,,maan jaaun us insaan ko jo andhe ko rang ki pahchaan kara de ,,,dua to dil se nikalti hai ,zuba se nahi ,,quki dua to uski bhi kubul hoti hai jiski zuban nahi :)

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