Friday, 12 July 2013

दो अठन्नियां,गली में चहकती वो गौरैया, और वो बूढ़े काका..

मेरे छुटपन की कुछ यादें हैं,
दो अठन्नियां,गली में चहकती वो गौरैया, और वो बूढ़े काका..
हर सुबह जाती थी मैं,
देखती टुकुर-टुकुर,अब्बू के काँधे पर चढ़,
किताबें काँधे पर रख,चलती ठुमक कर
और कजरारी आँखे झांकती, ढूँढती,
मिटटी के घरोंदे में बैठे, पथराई आँखों वाले काका को ,
ना जाने क्यूँ चिल्लाती थी वो,
ऐसे, जैसे चिल्लाता है वो मुंडेर पर बैठा मयूरा,
जब भीगता है बादलों के आंसू में,
और कुछ न कहते बूढ़े काका,
पर मुस्कुरा देते जब देखती मैं,
माँ की गोद से, टुकुर-टुकुर
किताबें काँधे पर रख,चलती ठुमक कर,
और मिलती मुझ जैसी ही, एक गौरैया,
चुगती दाने कुटुर-कुटुर
आज जा रही है डोली मेरी,सुर्ख जोड़े में,
भीगीं आँखों से देखती माँ को टुकुर-टुकुर
रास्ता वोही, पग-डग वोही, घरोंदे के बहार पड़ी चारपाई वोही
पर वो नहीं, जो मुस्कुरा देता था मुझे देख, माँ की गोद में,
सुना है कहीं चला गया, भूखा, बेबस,
और चली गयी वो गौरैया
जो खाती थी दाने कुटुर-कुटुर

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