Tuesday, 16 April 2013

The Women Bloggers


I seldom fulminate anyone because I am well aware of my imperfections and flaws.
Yes, I admit, Most of the times I finger what I see handy, voluminously horrendous idiocies, but, that too, just to laugh.
Okay, leaving it apart, if I speak of learning new things, I learn, I do learn, to be self-conscious and see my mistakes.
One thing that makes me happy is the number of brainy,well-informed and self-dependent women in my profile.
Mothers, social engineers, erudite, yet calm and managing.
At times I think, how will I be after twenty years, not only by looks but also by personality and aura, I can imagine myself, watching those grey locks tucked behind the ears and those fine lines on their face adding awards and honours to their experience.
I am a woman, I bear responsibilities, emotional-social-physical-hypothetical,
I get flummoxed many times yet I keep in mind, my targets, my duties and my womanhood.
I don't self-proclaimed, I don't announce, I don't brag, I just walk on the path I have decided. Dangerous, with no cornerstones and substratum yet the one I have chosen.
yes, It ain't easy but it is life and I live with a smile, just like you do, with those grey tresses battling with your eyelashes and those wrinkles - ornamenting your smiles, and those thick lenses resting on your noses.. 


Sunday, 14 April 2013

"राग मल्हार" - "Raag Malhaar"






आज मल्हार कुछ रूठी हुई थी, उसकी आँखों में वो चमक भी न थी। मैंने उसे बाहों में भरते हुए पूछा
" मेरी शोना को क्या हुआ . . आज उदास है?"


वो बोली कुछ नहीं , बस ज़रा सा मुस्कुरा कर बात को टाल गयी . रसोई की तरफ बढ़ते हुए बोली '' चाए बना दूं आपके लिए?"
"हम्म, आधी कप " और मैं बाथरूम की तरफ तौलिया काँधे पर लिए चल पड़ा .

मुंह -हाथ धो कर वापस किचन में गया तो मल्हार चाए बनाने में व्यस्त थी, मैंने उसे पीछे से बाहों में भर लिया और उसकी गर्दन को चूमने लगा। वो सिहर सी गयी, लेकिन उसकी सिहरन में छुपी मुस्कुराहट मैं समझ गया।
सूती साडी में वो बेहद खूबसूरत दिखती थी, ज्यादा लीपापोती न करते हुए बस हल्का सा काजल , माथे पर छोटी सी बिंदिया , और मेरे कहने पर मांग में ढेर सारा सिन्दूर लगाती थी ..

दिन भर की सिलवट पड़ी साडी , उसकी ठोड़ी के गहरे भूरे तिल को चूमती उसकी लटें , चेहरे पर मुस्कान, दिन भर की मेरी सारी थकान मिटा सी देती थी .

मर्द हूँ ना , ज्यादा भावुक होना ठीक नहीं, शायद इसीलिए हर रोज़ उसकी जी भर के तारीफ़ नहीं करता था , लेकिन बस जब भी उसको देखता फिर से प्यार हो जाता था
उसके मोटे - मोटे गाल और हँसते वक़्त वो गालो में पड़ते गड्ढे, मासूम सी बच्ची मालूम पड़ती थी , और थी भी तो बच्ची , शायद मुझे तभी किसी बच्चे की कमी महसूस नहीं हुई .
जब -तब उसका चटोरपना , आइस-क्रीम का दीवाना पन और हर बार सर्दियों में मुझसे डांट खा कर मुह फुला लेना और डांटने के एवज में मुझसे "डबल ट्रीट " की दो मेगा-बार खाना उसकी आदत बन चुकी थी !
और उसके इस बचपने को मैंने भी अपना लिया था. .

मैं माँ के कमरे में चला गया, वहां माँ-पिताजी और छोटा भाई बैठ कर बाते कर रहे थे और टीवी पर कोई प्रोग्राम देख रहे थे ,
मैं जा कर माँ की गोद में लेट गया, पिताजी को एक नज़र देखा , उन्होंने भवें उठा कर हाल-चाल पुछा और मैंने भी मुस्कुरा कर उनका आदर किया।


सोनू ने आते ही कह दिया "भैया कॉलेज के दोस्त जयपुर जा रहे हैं , मैं भी जाऊंगा , कुछ पैसे दे देना"
मैंने माँ की गोद से उठते हुए कहा "और तुम्हारे एक्साम्स, वो कब से हैं "
इतने में मल्हार बात काटते हुए कमरे में आई और बोली "क्या आप भी, बस शुरू हो गए, चाय पी लीजिये"


और इशारे -इशारे में दोनों देवर भाभी में "मैच फिक्सिंग" हो गयी, ज्यादा नहीं बस कुछ सालों का ही तो फर्क था दोनों में , दोस्त ज्यादा थे वो, और सोनू की सारी गर्लफ्रेंड्स की लिस्ट भी मल्हार को ही पता थी

चाय पीते पीते मैंने मल्हार को इशारा कर दिया था की थोड़ी देर में कमरे में आ जाये।
थोड़ी देर माँ-पापा से बात करके मैं कमरे में चला गया और इन्टरनेट पर मूवी का टाइम चेक करने लगा


इतने में मल्हार भी आ गयी और आ कर आदतानुसार मेरी पीठ पर हाथ फेरने लगी, मैं पेट के बल लेता हुआ, लैपटोप पर बटन टीपे जा रहा था

" शाम को चलोगी,? पिक्चर चलते हैं , बहार ही खाना खायेंगे"


"माँ-पापा को भी ले चलें?" वो चहकती हुई बोली
"महोल्ले को भी ले लो" मैंने व्यंगात्मक तरीके से उसको कहा !
वो मुंह बनाते हुए बोली, "हुंह , वो कौनसा बहार जाते हैं "
मैंने उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया और उसे होंठो को चूम लिया,
खुद को छुड़ाने लगी, लेकिन फिर शांत हो गयी और उसने आँखे बंध कर ली।
थोड़ी देर उसके होंठो को चूम कर मैं उसको बोल "बहुत बोलती हो, ज्यादा चपर चपर न किया करो"
उसने मुझे पकड़ कर खींच लिया "तो यूँ ही जुबान बंध कर दिया करो न"
उसकी आँखों में छुपी येही मुस्कराहट मुझे उसका दीवाना बना देती है , मैंने उसकी बाजुओं को कस कर भींच दिया,
जब दर्द से उसके चेहरे पर शिकन पड़ती थी, मुझे मज़ा आता था
वो किसी उत्तेजित हिरनी की तरह महकने लगती थी और मुझे अपने सम्पूर्ण होने का अनुभव होता था

"जाने दो !"
"तुमको भी पता है, मैं जाने नहीं दूंगा, क्यूँ बेकार दर्द लेती हो "
"कोई आ जायेगा"
"इतने सालो से कोई नहीं आया, अब कौन आएगा "
उसके कोमल उभारों के पीछे तेज़ धडकते दिल को महसूस कर सकता था मैं,
"आज भी वैसी ही हो, कुछ नहीं बदला"
और उसने हंस कर मेरे सीने में अपना मुंह छुपा लिया
"चलोगी? टिकेट करवा लूं ?"
और उसकी बिना हामी लिए मैंने रात की टिकट्स बुक करवा ली।

मैं एक आम व्यक्ति हूँ, बस खुद के लिए कुछ ज्यादा नहीं सोचता, सबके चेहरे पर येही मुस्कराहट बनी रहे, ऐसे ही कोशिश करता हूँ, कभी कर पाता हु कभी नहीं कर पाता।

दिन यूँ ही ढल गया और वो तैयार हो गयी, उसको देख कर दिल तो नहीं कर रहा था कहीं जाने का,
कुछ छेड़ा-खानी भी की, कि मैडम "दया-दृष्टि" दिखा दे, और मुझ भूखे को "खाना" मिल जाये
और वो हैं तडपाने में महारथ हासिल कर रखी है

खैर, अभी चलता हूँ "पति धर्म " निभाने
कोई "पत्नी पीढित संसथान" का नंबर जनता हो तो बता दे!!!