Tuesday, 5 March 2013

Fir Se Kahin...



घबरा सी जाती हूँ ये सोच कर मैं,
मेरे घबराए हुए चेहरे पे तेरा नाम न पढ़ ले कोई,
तेज़ साँसे, ये थर्थाते लब,
हलके से तुझे पुकार न ले कहीं,
ये सुर्ख लाली मेरी गर्दन की,
बयां न कर दे, बीती रात को
कैसे समेटूं खुद को बता,
शर्मा कर, बिखर न जाऊं कहीं,
तू तो पत्थर दिल है,
तेरा क्या,
साँसों को बाँध कर, कुछ इस तरह,
तुझे जाना था, तू ले गया,
अजीब बेचैनी है अब इस रात में,
आ, भर अपनी बाहों में फिर से,
तेरी कस्तूरी की महक से,
बहक न जाऊं कहीं

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