Skip to main content

Posts

Showing posts from 2013

जाड़ों सी,तुम्हारी याद

सर्दियों कि धुंधली सुबह सी तेरी याद नम करती आँखें कुछ वैसे ही कंपकंपाते होंठ और थरथराता जिस्म वैसे ही जैसे, जाड़े कि सुबहों में  तुम भीगे हाथ लगते थे और हँसते थे मेरे रूस जाने पर और सर्द रातों सी ये तेरी याद सुनसान रातों में किटकिटाते दांतों सी, खुद ही को देती सुनाई गर्म साँसों को फूँकती और हथेली को करती गर्म घिसती और टांगों के बीच छुपाती ठंडी सी नाक और खुश्क लब और उनमे बसी, जाड़ों जैसी, तुम्हारी याद.. 

एक पत्ता

शाख से टूटे पत्ते आ कर मेरी गोद में गिरे थे, पीले, चुरमुरे, रंगमिटे से आज उनमे से एक पत्ता किताब के पन्नो के बीच मिल गया, भूरा, चुरमुरा, अधूरा सा, ठीक वैसा ही ठहरा जैसे वो पल ठहरा है जब बारिष से पहले ज़ोरों कि हवा में उलझ गयी थी मेरी लटें, और सुलझाने के बहाने तुमने गालों को छुआ था मेरे, हाँ, वो पल, वैसा ही है , मटमैला, चुरमुरा और अधूरा

आधी किलो मुहोब्बत

"मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." ऐ लडकी? कैसी दी ये मुहोब्बत? ले लो साब, ताजी है, बीवी को देना, बहन को देना, बेटी को देना, सच्ची है.. हुंह, नही-नही, ये तो उसके लिए है.. ला! ज़रा आधा किलो देदे.. बाबूजी मुस्कुराते हुए, थैली घुमाते, आखों से ओझल हो गए ओर वो फिर चौराहे पर.. "मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." ए लड़की, भाग यहां से.. नेता जी की रैली है. नेता की रैली? फिर तो आज सारी मुहोब्बत बिक जाएगी.. रहने दो ना थानेदार साब, मेरी मुहोब्बत बिक जाएगी.. जनता: "नेता जी अमर रहे.. जब तक सूरज चांद रहेगा, नेता जी का नाम रहेगा. मै: नेता जी "मुहोब्बत ले लो, मुहोब्बत.. ताज़ी-ताज़ी मुहोब्बत.." नेताजी : बिलकुल, तुम देश का भविष्य हो.. हम मार्गदर्शन कर्ता हैं, पिता है. जनता हमारी संतान है.. सुनो बिटिया, ये सारी मुहोब्बत सरकारी कोष में डाल दो.. सरकारी कार्यवाही के बाद तुम्हें तुम्हारा हक मिलेगा.. भीड़ मे चुपचाप निकल ली, और मंदिर की सीढ़ी पर थक कर बैठ गई.. "मुहोब्बत ले लो.. मुहोब्बत...ता.." अरे पगली, प्यार बोल प्यार.. क्यों अम्म

तुम

तुम, श्याम हो, उस मेघ से, जो धरा के अधरों पर बरसता है! तुम, सिंदूरी हो, उस शाम से, जो भोर के आलिंगन को तरसता है! तुम, पैरों की पायल की वो खनक हो, लुका-छुपी में जो हरा दे, तुम, सुबह की चादर का वो सिलवट हो, जो बीती रात का गीत गुनगुना दे, तुम, अदा हो, जो मेरे काजल में कैद हो, मुसकुरा दे! © हिमाद्री

दो अठन्नियां,गली में चहकती वो गौरैया, और वो बूढ़े काका..

मेरे छुटपन की कुछ यादें हैं, दो अठन्नियां,गली में चहकती वो गौरैया, और वो बूढ़े काका.. हर सुबह जाती थी मैं, देखती टुकुर-टुकुर,अब्बू के काँधे पर चढ़, किताबें काँधे पर रख,चलती ठुमक कर और कजरारी आँखे झांकती, ढूँढती, मिटटी के घरोंदे में बैठे, पथराई आँखों वाले काका को , ना जाने क्यूँ चिल्लाती थी वो, ऐसे, जैसे चिल्लाता है वो मुंडेर पर बैठा मयूरा, जब भीगता है बादलों के आंसू में, और कुछ न कहते बूढ़े काका, पर मुस्कुरा देते जब देखती मैं, माँ की गोद से, टुकुर-टुकुर किताबें काँधे पर रख,चलती ठुमक कर, और मिलती मुझ जैसी ही, एक गौरैया, चुगती दाने कुटुर-कुटुर आज जा रही है डोली मेरी,सुर्ख जोड़े में, भीगीं आँखों से देखती माँ को टुकुर-टुकुर रास्ता वोही, पग-डग वोही, घरोंदे के बहार पड़ी चारपाई वोही पर वो नहीं, जो मुस्कुरा देता था मुझे देख, माँ की गोद में, सुना है कहीं चला गया, भूखा, बेबस, और चली गयी वो गौरैया जो खाती थी दाने कुटुर-कुटुर

हर बार

हर बार.. हर बात पर पूछ लिया "कोइ और तो नही" कभी तो अपने नश्तर-ए-अलफाज़ देखता, हर बात पर कह दिया "तू सिरफिरा है" कभी तो मेरा जुनून-ए-मुहोब्बत देखता तुझे देखा नंगी ऑखो से मैने इश्क को तमाचा जमाते हुए मेरी हथेली पर खिंचे हमसफर तेरी हथेती के सुर्ख निशां तो देखता, हर बात पर पलट बैठा पुराने पन्नो के हिसाब हर पन्ने पर लिखा अपना नाम तो देखता हर बात पर भर लेती हूं सिस्कीयां, यह इल्ज़ाम है तेरा, हर सिस्की में भरी सांस के पैगाम देखता, जा, कर दिया आज़ाद तुझे मुहोब्बत की उल्झनो से हर बात पर खिसकती रेत का सैलाब तो देखता हर बार ज़ख्म दे कर छोड़ दिया यूं ही, हर बार के दर्द की तासीर तो देखता, हर बात पर पूछ लिया "कोइ और तो नही" कभी झांक कर अपना गिरेबां देखता, कभी खुद ही का अंदाज़-ए-बयां देखता.. ©हिमाद्री

तेरी बाहों का आसरा..

बिखर जाती हूँ मैं, हर एक शब्द में ऐसे, जैसे तेरी बाहों का, आसरा मिल गया हो, जब भी लिखती हूँ, कहानी तेरे लफ़्ज़ों की, हंसती है ख़ामोशी, जैसे ज़र्रा हिल गया हो, कलम थिरकती है मेरी, स्याह करने कागज़ के बदन को, देख किस्सों की अंगडाई जैसे, बारिश का समां हो, वो हंसती है, रिझाने तुझको, झांके कभी सिरहाने से, वो किरदार है मेरी कलम की , फिर मांगे क्यूँ साँसे, तुझ बेपरवाह दीवाने से? चल हट! मुझसे ना कर बातें ऐसी, इश्क तुझे हो गया हो,  बिखर न जाऊं शब्दों में ऐसे, जैसे तेरी बाहों का मुझे  आसरा मिल गया हो…  - हिमाद्री 

काश फिर मिलने की वो वजह मिल जाये

काश फिर मिलने की वो वजह मिल जाये, तेरे संग बिताये वो पल मिल जाये  बातों बातों में जो बालियाँ कानो की खींची थी, रोई थी जब मैं, गीली आँखे मींची थी, कान पकड़ कर वैसे फिर से मुझे मनाये, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए, पुलिया पर लटकते हमारे पाँव, सपनो की दुनिया का चक्कर लगाते, चूंटी काट फिर तुम मुझे, वापस यहीं ले आते थे, कब, कैसे, बादलों की गुडिया बना देते तुम, जो पूंछू मैं, तो मुंह बना देते थे, वो बादलों की गुड़िया मिल जाये, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए …  आज कमर से भी लम्बी है मेरी चोटी , पर खींचने वाले तुम नहीं, देखती हूँ तुमको कभी, छुप कर, यूँ ही, पर बचपन वाला यूँ नहीं, कद बड़ा तो बढ़ गए फासले भी , न कच्ची कैरियां, ना वो त्योरियां अब, कान की बालियाँ कभी जो खिंच जाए, वो सिसकियाँ कहे, काश फिर मिलने की वजह मिल जाए ...