Tuesday, 3 January 2006

खामोशी की आवाज़।


घुप अँधेरे सा सन्नाटा,
उसे चीरता एक आगाज़,
वो चुप,
खामोशी की आवाज़।

कुछ न कहकर भी 
सब कुछ कह 
सौ बड़बोलों में खामोश हो जाना 
है ये एक पल का राज़,
वो चुप 
ख़ामोशी की आवाज़ 

अपने गम का घूँट पी जाना,
सितम क्यों खुद पर उठाना?
हमेशा नहीं जीत पाती,
वो चुप,
ख़ामोशी की आवाज़ 

सहिष्णुता का संबोधन,
नारी का है गहन अध्य्यन
अबला है कहलाती,
जो चुप है रह जाती,
न समझ सका उसे कोई,
छुप के कोने में है रोई 
नहीं सुनाई देती उसकी
वो चुप 
ख़ामोशी  की आवाज़ 

किसको नहीं है चुप्पी भाति?
जब है सबकी जान पे आती ,
देह चीर कर चला गया वो,
ध्वंस कर के आबरू को,
देखती रही निगाहें 
लेकिन वाणी फूट न पाए,
मूक है, हर कोई आज 

इससे तो भली,
वो चुप 
ख़ामोशी की आवाज।।

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