That's So.. Himmilicious..!

Sapiosexually High, Writer, Researcher, Cult, Erotic and Romantic aesthetics, Gender and Sexual politics, Fictionist, Lover, Daughter

Wednesday, 29 July 2015

Handbook to write PhD synopsis/ proposal


Handbook to write PhD synopsis/ proposal- Review after first draft
•Write something about 500 words, and delete it.
•Find your note book in the hay of print outs and utter in frustration "abey.. kahan likha tha yaar"
•Type, type, type and type;wait a minute, delete, delete and type again.
•Good.
•Now next paragraph.
•Read it thoroughly and say "kis gadhe ne ye point yahan likha hai- maine hi"-- select and cut that paragraph and paste it at the last section after 18 pages.
"How dafuqe do we make such tiny table in msword. Well google wikiHow"
•If someone switches off the phone, yell and jump save the print outs scattering everywhere in the room.
•Crawl like zombie with no legs under the bed and fetch those notes and that pencil "oh.. i found my alovera cream and hair band too!!
•Open the journal website and look for ERR_WEBPAGE_NOT_RESOLVED for like 6 times and then Google some other .edu website.
•Find your phone somewhere inside the printouts, books, notes, half eaten sandwich, and call your guide for some doubt
•Dont be disappointed by the unanswered call.
•Scroll all the pages top to bottom and bottom to top once. Take a deep breath and read again.
•Type, type, click, correct, delete, find appropriate adverb, fit it,"perfect! looks good"
......damn! It changed whole timestamp!!
•change all past tense into future time
Read again.. click.. click..
•Stretch your arms and legs like a dog.
Stand up from the chair and look at the watch With that"Oh teri" reaction sit again and repeat all the abovementioned steps.
• stop the crave for samosa and chai, you are already 70 kgs!
P.s dont bath and eat that cucumber sandwich.
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Friday, 17 July 2015

another Crisis

The most common statements I hear being into academics are "you have got nothing else to do" .."you hav no practical knowledge about the world" .."bookish" "Jobless" "Because you do 'nothing', you become fussy and frustrated, go join a gym or get some job" .."oversmart" Earlier I used to be demoralized and then father once told, "our surrounding is full of people who measure success by monetory terms, what position you are holding, which chair do you represent and how fat is your account, they have nothing to do with the numbers of book you read or how dedicated you are towards your chosen path. But then, it is your decision, do you really want to live among that class or have you dremt of a better life when you will break your cocoon?
Some things take patience and more than required time, when you feel that the world is settled but you are still in the middle of nowhere."
It somehow managed to convince me that he was right, he made his point.
but still the issue is we have to deal that majority, we cannot avoid it, Trust me I still do and I just end up ignoring those people as if they don't exist.
or maybe I chose to be Blind because I cannot keep on proving each Anti-Education person, the value of higher education. They will certify me as crazy as they say " jyada padhne se dimag kharab ho jata hai" :D
meanwhile dealing with the crisis another came up,
"What If I get a life partner who doesn't value the education the way I do, or his family too, It is like rotting in hell if he would think the way other's did, so far?" is the another big doubt I suffer.
There will be big conflict in the ideas and perspectives.
I am sure most of my age singles are dealing with this shit too and have no idea where it is going to be.lol.

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Wednesday, 8 July 2015

The man and the wife

I chose to be blind and good with my ears.
I have stopped being an espionage for his deeds and I shifted him from my first priority.
and I have firmly prepared my head to catch my heart the next time it breaks.
That's how I chose to be happy and made efforts towards it..
That's how he became a loyal man and I, a wife.

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Saturday, 9 May 2015

"परिणय" #8815


महज़ इत्तेफ़ाक़ था शायद उन्होंने आज ये बात छेड़ दी, "मैं आज भी नफरत करता हूँ उससे" किचन से बहार आते वक़्त मैंने हाथ पोंछ कर तौलिया डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर ही टांग दिया।
"क्यों बुरा सोचते हो बीती बातों का, जाने दो, क्या फायदा होगा?" कहते हुए पीछे से उसके काँधे पर सर रख दिया मैंने।
"हम्म ठीक कह रही हो, एक ग्लास पानी पिला दो" और उन्होंने AC चला दिया, "गज़ब की गर्मी है भाई, वापस कब जाना है तुम्हे?"
मैं कुछ बोली नहीं, मैं जाना ही नहीं चाहती थी, कहने का मन तो यह था की बोलू चलो ना पहाड़ों पर छुट्टी चलें, पूरा साल भर से ज्यादा हो चुका है,"कबीर, दफ्तर में सब कैसा है?"
"ठीक ही है, काम बहुत ज्यादा रहता है"
"हम्म"
"तुम वापस कब जा रही हो?"
"बता दूँगी.. अभी हूँ यहाँ"
"हम्म"
काफी देर एक ख़ामोशी ने घेर लिया उसके बाद हम दोनों को, माहौल काफी गंभीर हो चुका था बीती बातों के बाद, मैंने सोचा मैं ही बातों को घुमा दूँ, कबीर टीवी के चैनेल्स बदलने में लगे थे
मैंने शरारत सोची और बर्फ का एक टुकड़ा निकल लाइ फ्रिज में से..
पीछे से उनकी शर्ट में डालने ही लगी थी की उन्होंने हाथ पकड़ लिया..
"अच्छा बेटा.. शैतानी करेगा?.."
मैं हंस दी.. और बर्फ को अपने मुंह में डाल लिया।
कबीर ने मुझे अपनी तरफ खींचा और मेरा मुंह दबा दिया की मैं बर्फ निकाल दूँ।
मैं हंस भी रही थी और मुंह भी भींचे हुई थी क्योंकि मुझे पता था एक बार उनके हाथ बर्फ आ गई तो बस मुझे गुदगुदी कर कर के रुला देंगे..
भला हो पिज़्ज़ा वाले का टाइम पे आ गया, वरना आज शामत थी, कबीर को छेड़ने का मतलब है, बस सोने नही देते वो सज़ा के तौर पर..
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"परिणय" 090515

"परिणय"
सिनेमा हॉल के काउंटर पर खड़े, सेल्स एग्जीक्यूटिव को हूल देते हुए बोले "शादी हो गयी तुम्हारी?"
वह लड़का शरमाता हुआ बोला" शादी.. नहीं सर.. अभी कहाँ शादी"
"हम्म.. बेटे तभी नहीं पता, किसी तरह ऊपर की सीटें निकलवा दो वरना सन्डे तक खाना नसीब नहीं होगा ज़िन्दगी नर्क हो जायेगी"
फिर मेरी तरफ देख कर बोले " मतलब वो नहीं था तुम जानती हो"
मैं बस हंसी रोक नहीं पाती कबीर की ये सब हरकतें देख कर, टिकट काउंटर के दोनों लड़के दांत दिखा कर हंस रहे और मुझे और मैं भी बड़ी सी मुस्कराहट लिए अपने गालों के गड्ढो को घर रही..
"सर शुरू की 4 रोज़ खाली हैं, बाकि सब भर चुकी हैं.. आप चार बजे का शो ले लीजिये"
"चार बजे!!! अरे भाई मरवाओगे क्या? हमारी मोहतरमा यही छुट्टी कर देंगी, 2 बजे मतलब 2 बजे.. आदेश है उनका, पूरा करना पड़ेगा वरना ताने दे दे के मार डालेंगी.. अरे बंधू कुछ करो"
मैं टुकुर टुकुर कबीर की तरफ देख रही थी, मेरी तरफ देख कर बोले,"आगे की सीट चलेंगी मैडम?"
"नो" मैंने भी इतराते हुए जवाब दे दिया..
"देखा, अरे बड़े भाई को बचा लो बंधू, मैं अच्छा रिव्यु दूंगा और 10 दोस्तों को रेकमेंड कर दूंगा"
"सर, फ़िल्म शुरू होने के 5 मिनट पहले बता पाउँगा" कह कर वो कबीर की बोतल में उतर चुका था..
"तुम कितने चेक फड़वाते हो मेरे नाम के ना" मैंने कबीर के कंधे पर मरते हुए बोला "खाना नहीं देती मैं??"
"अरे भई, समझा करो, शादीशुदा मर्द से हर कोई सहानूभूति रखता है" कबीर कन्धा मसलते हुए बोले, "दे देगा ऊपर की सीट्स, होती है मेनेजर के पास"
"हाँ तो तुम शादी शुदा कहाँ हो?"
"अरे, दिखता तो हूँ ना, उस बेचारे को क्या पता, मैं तो खौफ डाल आया लड़के के मन में तुम्हारा"
"सारे ज़माने के लिए चुड़ैल बना रखा है मुझे"
"बड़े दांत वाली चुड़ैल" और यह बोल कर वो ज़ोर से हंस पड़े
"उन्न्न" मैंने भी मुंह चिढ़ा दिया और कबीर का हाथ पकड़ कर फ़ूड कोर्ट की तरफ चल पड़ी..

शादी नहीं हुई हमारी, हम एक साथ रहते हैं, दोनों के परिवार वाले बैंगलोर में हैं और हम दोनों यहाँ, दिल्ली में।
कबीर बैंक में मेनेजर हैं और मैं कॉलेज में इतिहास पढ़ाती हूँ, हमारा रिश्ता काफी उतार चढ़ाव से निकलता हुआ यहाँ तक पहुंचा, लेकिन एक अजीब सा बंधन है हमारे बीच, हम दोनों एक दुसरे के लिए जीते हैं, और इसके लिए हमे कोई ख़ास मशक्कत नहीं करनी पड़ती.. साधारण सी ज़िन्दगी है, दफ्तर दोस्त और मैं, यही कहते हैं वो सबसे, ज़रा सा रूठ जाऊं तो जैसे अधूरापन फ़ैल जाता है ज़िन्दगी में और मेरे अंदर भी टीस ऐसे उठती है मानो अंदर से कुछ निकल गया हो और सब खाली सा हो गया हो..
"पूर्णिमा, सुनो, सीने में अजीब जलन सी हो रही है"
"क्यों क्या खाया था? बहार गए थे ना सुबह गाडी लेकर!"
"हाँ यार, भोले चटूरे खाए थे"
"भोले-चटूरे"!! हाहाहा.. तुम भी ना.. चलो इनो ले लेते हैं"
मर्दों को समझना इतना मुश्किल नहीं है, बस दिक्कत ये है की वो कुछ जताते नहीं है और हम औरतें इतनी स्वार्थी होती हैं की जब तक शब्दों में ना कहा जाए कुछ समझ ही नहीं पाती, सुबह से कबीर भी यूँही घूम रहे थे, काम निपटा रहे थे, गाडी सर्विसिंग पर देना, बैंक जाना, यही सब शनिवार के काम और जल्दी में नाश्ता किया नहीं, दोस्तों के साथ खाली पेट दबा लिए "भोले चटूरे" और अब दर्द..
ज़िद करके दवा ना दो तो सारा दिन ऐसे ही चिढचिढे रहेंगे और खुद को भी नहीं पता चलेगा आखिर हुआ क्या है..
अब कबीर तो ऐसे ही हैं..
"मैं कुछ नहीं खाऊंगा, बता रहा हूँ, आगे बढ़ के मुँह में मत ठूसने लगना" इनो पीने के बाद कबीर बोले..
बड़ी अजीब आदत होती है न हम लड़कियों की, जब भी बहार जाते हैं, खुद खाना पीना भूल जाते हैं और बस उनको खिलने में लग जाते हैं, जैसे बच्चा साथ चल रहा हो, हर चीज़ बार बार पूछना, खुद ही खिला देना, उनकी पसंद का ध्यान रखना, जो उन्हें खाना हो वोही आर्डर देना, धीरे धीरे पता नहीं चलता और हम कब अपनी पहचान खो कर उनके हो जाते हैं..
.. शायद, इसी तरह से हम बन हैं, जिस रूप में चाहो ढाल जाते हैं, मैं भी कई बार कोशिश करती हु की मैं रहूँ लेकिन पता नहीं क्या, जैसे ही कबीर सामने आते हैं, बस उनकी पूर्णिमा हो जाती हूँ, बहार, काम पर, दोस्तों के साथ, अपनी एक अलग पर्सनालिटी होती है, दमदार जो देखता है इम्प्रेस हो जाता है लेकिन ऐसा क्यों होता है की एक इंसान ज़िन्दगी में होता है जिसके लिए हम सब कुछ त्याग कर समर्पित हो जाते हैं.. मैं समझ नहीं पाई, और काफी परेशानिया भी झेलनी पड़ी इस आदत के चलते, अपनी ख़ुशी से पहले उसकी ख़ुशी और उसकी पसंद...."
"आज चुप क्यों हो? सब ठीक है?" मेरे ख्यालों को तोड़ते हुए और ऊपर से चौथी रो की टिकट लहराते हुए कबीर बोले..
"मिल गई?" मैंने आश्चर्य से पूछा
"अरे मैडम, ज़माना तो है नौकर बीवी का" आँखे मटकाते हुए हमने सिनेमा हॉल में एंट्री की..
और बहुत कुछ है बताने को, पीकू देखने के बाद बताती हूँ..
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Thursday, 9 April 2015

परिणय..


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Tuesday, 24 February 2015

मैं Abnormal हूँ

 मैं Abnormal हूँ मुझे इंसानो से ज्यादा किताबो और जानवरों से प्यार है, सामजिक होने के जगह मैं एकांत में कुछ समय बिताना पसंद करती हूँ, मुझे खाली बैठने से कोफ़्त होती है.. कभी कभी सोचती हूँ पीएचडी के बाद क्या सफ़र ख़त्म हो जायेगा? फिर लगता है ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत होगी.. एक नया रास्ता जहाँ इश्वर ले जाएगा.. आत्ममंथन ज़रूर है, डगमगाता आत्मविश्वाश भी है, लेकिन जब कुछ लोगो के मेसेज देखती हूँ "हिम्मी दी यू आर माई इंस्पिरेशन" "मैं आपकी तरह बनना चाहती हूँ" " मैम आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है" और वो सभी छोटे छोटे सवाल जो बेहिचक लोग मुझसे पूछते है यह विश्वाश करके की देर से ही सही जवाब आएगा ज़रूर.. और कभी कभी लंबी कहानी लिख देते हैं जैसे मानो अपने दिल की बात कह दी हो, मैं पूरा पढ़ती हूँ अच्छा लगता है अनजान लोगो के दिल की बात जानकार.. करने पर आओ तो सब कुछ न्यौछावर करने की आदत से थोडा परेशान हूँ क्योंकि नेकी कर के बहुत जूते खाए हैं, इतने तो बर्गर नहीं दबाए होंगे जितने राज़ दबाये हैं.. लेकिन जो भी कहो "क्रिस्पी हनी सेसमे स्टिर फ्राइड" धोखों का ज़ायका ही अलग होता है.. अब तो लगने लगा है खुशनसीब हूँ कम से कम जूते, गालियां और धोख़े तो चखने को मिल जाते हैं मुझे, वरना आज कल कोई किसी के लिए करता ही क्या है, स्वार्थ सर्वोपरी स्वानंद का सुविचार साध कर समस्त ब्रहमांड सइ केवल लेने की वालों की तो अनंतकाल से परे अंतहीन कतार है.. हम देने वालो की कतार में सही, कोई खुश होकर सोचता है 'हाहा लेली बल्ले बल्ले" महाकवि माननीय डॉ कुमार विश्वाश जी साहब की तर्ज पर.. "कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है.. मगर देने की संतुस्ती केवल वोही समझता है.. के जिसके पास होता है वो ही तो दे सकता है उनकी नादानी पर फिर मेरा दिल हँसता है.. खरीद सकता है हमको वो जो सच की राह चल जाये किसी पर है समय इतना की रिश्ता वो बना जाये हमारी एक गुज़ारिश में उनका दम "फुस्स" से निकलता है.. हम भी समझ जाते है वो कितने में बिकता है.. कोई चूचूं समझता है, कोई फ़र्ज़ी कहता है मगर ईमान उसका भी गिरेबाँ से झलकता है.. ह्म्म्म.. ह्म्म्म..ला.. ला.. ला.. कुमार साब पुच्ची पुच्ची :-* आई लव यू टू! :P
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बेहतरीन!

बेहतरीन! डॉ. कुमार विश्वाश और अरविन्द केजरीवाल की दो बात से मैं सहमत हूँ, यही मेरे पिता का व्यक्तित्व रहा है जिसकी मैं प्रत्यक्ष रूप से साक्षी हूँ और इसी "सच" के सफ़र में किस भट्टी में मैं तपी हूँ इसके वह साक्षी हैं, बस यही एक बात जिसकी मैंने धुनि रमाई हुई है "सच और ईमानदारी" इसपर चलने वालो को ना ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है बल्कि एक लंबा संघर्षपूर्ण जीवन जीना पड़ता है दूसरा "अहंकार".. कहावत है "अकड़ तो केवल मुर्दों में होती है और सूखी लकड़ी ही जल्दी टूटती है" रोटी के पहले निवाले के साथ ही जैसे ही सुना केजरीवाल की हिदायत "साथियो घमंड मत करना, मुझे डर भी लग रहा है "और विश्वाश साहब का ट्वीट "सम्मान के साथ बीजेपी का विपक्ष में स्वागत है" मुंह से बस एक शब्द निकला "वाह" मैंने लगातार तीसरी बार केजरीवाल(आप) को वोट दिया है यह सोच कर नहीं की जीत होगी या हार बल्कि यह सोच कर की हर "आम आदमी" की यही सोच होती है, वह ही सबसे बड़ा भक्षक है और सबसे बड़ा रक्षक भी। निरंतर प्रयास करने से क्या नहीं मिलता, देर से ही सही, कम ही सही लेकिन आत्म संतुष्टि और आत्मविश्वाश से परिपूर्ण जीवन जिसमे हम सर उठा कर और नज़रे मिला कर सबके सामने खड़े हो सकते हैं.. सत्य बोलने में जो आनंद है वो बेईमानी और झूठ बोलने में कहाँ, एक झूठ बोल कर, ना जाने आप ज़िन्दगी में क्या खो बैठे और आपकी वजह से किसी को ना जाने कितनी तकलीफों का सामना करना पड़े। सामाजिक परिधि तो अंतहीन है, सूक्ष्म रूप से केवल अपने रिश्तों को ही देख लें आप खुद ही भांप जाएंगे.. जिन लोगो को आपने खो दिया, जिस तकलीफ का आपने सामना किया, पीढ़ा की जिस अग्नि में आप जले उसके बाद आपको आत्मग्लानि होती है, उन रिश्तों को खोने का पश्चाताप होता है, आप अपमान सहते हैं, आप विश्वाश खोते हैं, आप किसी ना किसी बहाने से खुद को ही झूठ बोल कर, अपनी कुंठा और अपने अंदर के विनाशक को दबाने के लिए, जीने के लिए, खुद को धोखे में रखते हैं की आप सही थे या समय खराब था.. या आपको उस दर्द और लंबे संघर्ष के बाद आपका आत्मविश्वाश अधिक गहरा हो जाता है, आप और विनम्र हो जाते हैं और दुसरे के दर्द को समझ पाते हैं, उनको भी माफ़ कर देते हैं जिनके कारण आपको कष्ट सहना पड़ा और साथ ही इश्वर पर और भरोसा होता चला जाता है और आप समझ जाते हैं की आपको ज़िन्दगी के कुछ मूल सिखाने के लिए उसे चाबुक चलाने ज़रूरी थे.. पश्चाताप के आंसू नहीं, रह जाती है तो केवल मुस्कराहट की "असली सफ़र तो अब शुरू हुआ है, अब तक तो बस गिर कर घुटनो के बल रेंग रहे थे, खड़े हुए हैं अभी दौड़ना बाकी है" मंजिल तक पहुँचने में जो लोग रास्ते में छोड़ गए या छूट गए वो अगर "सच" बोलने के कारण अलग हुए तो यकीं मानिए वापस ज़रूर आएंगे और यदि आपने "झूठ" बोलकर उनको खो दिया तो कर्मो से ठीक कीजिये ना की बातों से, आखिर कब तक अपने आपको फन्नेखां समझेंगे? जब काँधे पर ले जाने वाले भी नहीं बचेंगे तब? खैर, यह तो सियासी पारी का आगाज़ मात्र है, अगर "आम" बने रहे तो दर्द भी मिलते रहेंगे और जीत के अंजामी ब्युगल भी बजते रहेंगे, और लोग आपके मुरीद होते रहेंगे.. चलती हूँ, नमस्ते!
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Saturday, 7 February 2015

Valentines ouch.. 2015

❤FEBRUARY.. Yaay..

The month of love.. love everywhere.. and I'm yet to feel how special a woman feels being in love, how proud she becomes to have the man who completes her.. How beautiful is it to be in love..? How does it feel at all, overall..?

Maybe after some more years I shall also show off the cute pictures and collage of captured memories forever ..
.. but till then, let me be allergic to relationship, being sarcastic and mocking to couples, being single, being unmarried, being unloveable, being worst girlfriend material, being threat of insecurity to all women..

Simply cannot see PDA on facebook.. and outside as well.. it hits at the right place!

Ouch! Use protection, avoid hotel rooms, check out for hidden cameras, just don't get pregnant, don't be melodramatic and over emotional, Think before you say YES to proposals, don't commit suicide for the sake of one sided infatuation, accept that it's over and the pseudo self created hallucination of "yuss.. you're da one!!" Has apparently screwed your life. Last but not the least don't hate being in love because people ditch, feelings don't. Stick to the one you have, it's better to fight with the one you love than loving someone you don't know at all, stand by no matter what and remember..

A friend working in MNC who understands your need is a friend indeed so don't hesitate to ask for the keys!

Happy "well-in-time" month.. don't disturb me!

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