Tuesday, 24 February 2015

मैं Abnormal हूँ

 मैं Abnormal हूँ मुझे इंसानो से ज्यादा किताबो और जानवरों से प्यार है, सामजिक होने के जगह मैं एकांत में कुछ समय बिताना पसंद करती हूँ, मुझे खाली बैठने से कोफ़्त होती है.. कभी कभी सोचती हूँ पीएचडी के बाद क्या सफ़र ख़त्म हो जायेगा? फिर लगता है ज़िन्दगी की एक नई शुरुआत होगी.. एक नया रास्ता जहाँ इश्वर ले जाएगा.. आत्ममंथन ज़रूर है, डगमगाता आत्मविश्वाश भी है, लेकिन जब कुछ लोगो के मेसेज देखती हूँ "हिम्मी दी यू आर माई इंस्पिरेशन" "मैं आपकी तरह बनना चाहती हूँ" " मैम आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है" और वो सभी छोटे छोटे सवाल जो बेहिचक लोग मुझसे पूछते है यह विश्वाश करके की देर से ही सही जवाब आएगा ज़रूर.. और कभी कभी लंबी कहानी लिख देते हैं जैसे मानो अपने दिल की बात कह दी हो, मैं पूरा पढ़ती हूँ अच्छा लगता है अनजान लोगो के दिल की बात जानकार.. करने पर आओ तो सब कुछ न्यौछावर करने की आदत से थोडा परेशान हूँ क्योंकि नेकी कर के बहुत जूते खाए हैं, इतने तो बर्गर नहीं दबाए होंगे जितने राज़ दबाये हैं.. लेकिन जो भी कहो "क्रिस्पी हनी सेसमे स्टिर फ्राइड" धोखों का ज़ायका ही अलग होता है.. अब तो लगने लगा है खुशनसीब हूँ कम से कम जूते, गालियां और धोख़े तो चखने को मिल जाते हैं मुझे, वरना आज कल कोई किसी के लिए करता ही क्या है, स्वार्थ सर्वोपरी स्वानंद का सुविचार साध कर समस्त ब्रहमांड सइ केवल लेने की वालों की तो अनंतकाल से परे अंतहीन कतार है.. हम देने वालो की कतार में सही, कोई खुश होकर सोचता है 'हाहा लेली बल्ले बल्ले" महाकवि माननीय डॉ कुमार विश्वाश जी साहब की तर्ज पर.. "कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है.. मगर देने की संतुस्ती केवल वोही समझता है.. के जिसके पास होता है वो ही तो दे सकता है उनकी नादानी पर फिर मेरा दिल हँसता है.. खरीद सकता है हमको वो जो सच की राह चल जाये किसी पर है समय इतना की रिश्ता वो बना जाये हमारी एक गुज़ारिश में उनका दम "फुस्स" से निकलता है.. हम भी समझ जाते है वो कितने में बिकता है.. कोई चूचूं समझता है, कोई फ़र्ज़ी कहता है मगर ईमान उसका भी गिरेबाँ से झलकता है.. ह्म्म्म.. ह्म्म्म..ला.. ला.. ला.. कुमार साब पुच्ची पुच्ची :-* आई लव यू टू! :P
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