Wednesday, 26 July 2017

बोझ

कभी यादों को बोझ होते देखा है?
उन पत्तियों सी झुक जाती हैं जिनमे ओस भरी हो,
सुबह सवेरे गिर जाती हैं जैसे रतजगी रोई हो,
पर सुबह भी कभी कोई रोता है?
अब हर कोई ना तुझसा है ना मुझसा,
माँ कमरे में आ जाए तो झूठे मुँह
आँख में ओस भर कर सोता है..

(माँ को पता ना चले, कई बार सिसकियाँ दबा कर भरी आँखों से सोने का नाटक किया है..)

Tuesday, 25 July 2017

अरेंज्ड भसूडी

डिस्क्लेमर: इस कहानी के सभी पात्र भैंस की आँख सच्चे हैं.. और सत्य घटना से इसका लेना देना है! पात्रों का मेरी ज़िंदगी से क्या लेना देना है ये कोई घंटा नहीं जानता।

तो बात कुछ ऐसे शुरू हुई की कल था शनिवार और हमारी छुट्टी।
सुबह उठने का मन नहीं क्यूँकि पिछली रात टिंडर पर बातें करते करते बज गए. (जज मत कीजिए जवान हूँ सिंगल हूँ और आयुर्वेद, होमियोपैथी और घरेलू उपचार के गुणगान गाने की उम्र नहीं है)
हाँ जी, तो सुबह देर से उठी, दत्तो (हमारी कामवाली) को सख़्त हिदायत दी गयी थी झाड़ू पोछा लगाने के बाद पंखा चला के जाए और काली (हमारी कुतिया) को हिदायत थी की मेरे कान पर भौंके, बाल्कनी में भौंके!
ना काली मानी ना दत्तो! पतनहि ये औरतों में सुबह पंखा बंध करने की आदत कब जाएगी..
रियलिटी ये है साहब ये सब " सो स्वीट" वाले कुत्ते सिर्फ़ फ़ेस्बुक विडीओज़ पे वाइरल होते हैं सच्चाई में ये कान के आगे भौंकते हैं, दिन भर खुजाते हैं और वोही खाना खाते हैं जो आपकी प्लेट में है।
ख़ैर, हम उठे तो पता चला काली भौंक रही थी चुलबुली बुआ के आने पर।
वैसे चुलबुली बुआ का असली नाम शाकंभरी देवी था, क्यूँ था यह नहीं पता। शादी-वादी में लोगों को सुना था उनको चुलबुली भाभी बुलाते हुए तो हम लोग भी चुलबुली बुआ कहने लगे।
पहले तो माँ आँख दिखाती थी अब क्या दिखाएगी अब तो हम ख़ुद ना जाने कितने बच्चो की बुआ हो लिए। 

ख़ैर, तो सुबह हम उठे बुआ आयी हुई थी, हम बिखरेबालों में आँख मचलते हुए बड़ा सा कच्छा और टीशर्ट पहने चले गए उनके सामने ( अब कच्छे को बरमूडा बोलने से वो कच्छा नहीं रहेगा?)
देखते ही बुआ ऐसे लिपटने लगी जैसे मैं चंदन और वो सांप.. "हाए मेरी ग़ुड्डो कितनी बड़ी हो गयी" हम भी मुस्कुरा कर उनको चिपटा लिए (बड़ी? बुआ मैं बड़ी नहीं चौकोर हो गयी हूँ.. जिमिकंद की तरह  यहाँ वहाँ और जाने कहाँ कहाँ से फैल गयी हूँ सच बोलो पाप चढ़ेगा

छूटते ही बुआ बोली "अरे कोई लड़का वड़का देखा कि नहीं?" फिर मेरी तरफ़ देख कर के बोली "ही ही ही आजकल तो बच्चे अपने आप देख लेते हैं" माँ बोली "तुम ही देखो कोई नज़र में हो तो शक्को" और बापू हानिकारक हमारे बोले "पढ़ रही है अभी तो नौकरी लग जाए पहले.." 

(एक ये गवर्न्मेंट पिताजियों के बारे में बात होती है की नौकरी मतलब सरकारी चाहे आप चपरासी क्यूँ ना हों, प्राइवट नौकरी में हम अच्छा कमा रहे हैं, नहीं! आपको काग़ज़ पर जेनरल मैनेजर लिख के दिया जाता है लेकिन काम आप फ़ोटोकापी का ही करते हैं)

ना ना करते हुए चाय के साथ जिम जैम का पूरा पैकेट चैट कर चुकी बुआ बोली "ग़ुड्डो कहाँ नौकरी कर रही हो
"नेओडा"
"ओह नॉएडा" दूर है बहुत.. नई
"हम्म"
"और बुआ कैसे आयी?"
पापा की तरफ़ देखते हुए बोली "रिश्ता लेके आइ हूँ, वो मेरी नंद की जेठानी का लड़का है ना, मनोरंजन.. स्पेन से लौट आया है तो वो बोल रही थी लड़की देखने को, हमारी गुड्डी के लिए एकदम सही है"

"तुमको कैसे पता बुआ की मेरे लिए कौन सही है?" दिखा दी हमने मुँहफटि और माँ ठिठक गयी की "लड़की चटक ज़ुबान है" का तमग़ा ना लग जाए..

मम्मी तो मम्मी होती है ना, मम्मीपना तो दिख़ाएगी.. "तू चुप कर और नहा ले" लो जी.. भगा दिया.. मतलब क्या? काली गाय समझा है क्या जब घी की रोटी खिलानी हो तब पूच पुच कर दिया और गोबर करने का टाइम आया तो भगा दिया

(गौरक्षक इग्नोर करें

कुछ नहीं, हम चले नहाने.. वैक्सिंग भी करनी थी और फ़ेशल भी, कौन बुआ की तरफ़ ध्यान दे.. "पप्पा की परी" हूँ मैं वो सम्भाल लेंगे और माना कर देंगे जिस भी लक्कडबग़घे को मेरे पल्ले बाँधने बुआ कर रही है..

टॉलेट में बैठ कर हम भी टिंडर चेक करने लगे, कुल मिला के १६ मैचेज़ थे जिसने 11 मैरीड निकले झूठेल बांब, जस्ट लुकिंग फ़ोर लाइक मायंडेड पीपल तो हैंग अराउंड विद, बाक़ी दो 'नथिंग.. जस्ट गोइंग विद फ़्लो एंड लेट्स सी वट हैपेंज़" वाले थे..


दो चार की गुड मोर्निंग का जवाब देके, ऑफ़िस मेल्ज़ चेक की, फ़ेस्बुक नोटिफ़िकेशंज़ देखी और नहाने चले गए..